Sunday, October 14, 2012

American Election: Not different from India.

शहर से थोड़ी दूर रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी की रैली। हमारे देश में होने वाली रैलियों से अलग नहीं। वैसी ही भीड़-भाड़। उम्मीदवार का देर से पहुंचना। और भीड़ को रोके रखने के लिए तेज संगीत। इस भीड़ को अगर हिंदुस्तानी चेहरों और पाश्चात्य संगीत को फिल्मी गानों से बदल दें तो अंदाज लगाना मुश्किल होगा कि हम भारत में हैं या अमेरिका में।

हजारों लोग, लेकिन सभी कतार में। बिना कड़ी जांच सभा स्थल में किसी को प्रवेश नहीं। अमेरिकी चुनाव में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा अर्थव्यवस्था है। मिडिल क्लास के लिए इकोनॉमी का मतलब नौकरी और टैक्स ही है। भारत और अमेरिका दोनों में।अमेरिकी नेता भी यह बात जानते हैं। लिहाजा रोमनी भाषण की शुरुआत में जनता से सीधा सवाल पूछते हैं- अगर आप किसी कंपनी के शेयर होल्डर हों और ऑडिट के वक्त पता चले कि कंपनी भारी नुकसान में है। कर्मचारियों की नौकरियां जा रही हैं। तो आप कंपनी के सीईओ के साथ क्या करेंगे? लोग चीखते हैं कि हम उसे कंपनी से निकाल देंगे। सुनते ही रोमनी का चेहरा चमकने लगता है। कहते हैं - मैं भी तो यही कह रहा हूं। हमारे लोगों की नौकरियां जा रही हैं। हम पर टैक्स का बोझ बढ़ रहा है। यह मौका है बराक ओबामा को हटाने का।

इन्हीं मुद्दों ने राजस्थान के टोंक के रहने वाले विजय पटेल जैसे अमेरिका में नौकरी कर रहे हजारों भारतीय युवाओं को भी परेशान कर रखा है। वह एक नामी आईटी कंपनी के लिए अमेरिका में काम करते हैं। पिछले लगभग तीन साल से अमेरिका में हैं। अब उनके वीजा की मियाद खत्म होने वाली है। उन्हें लग रहा है कि उन्हें एक्टेंशन नहीं मिलेगा। क्योंकि जो भी नई सरकार होगी वो बाहरी नौजवानों के बजाय अमेरिका के युवकों को ही नौकरी देने को तवज्जो देगी। लिहाजा वो वापस मुंबई लौटने की तैयारी में जुट गए हैं।

तकनीकी तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव हमारे चुनाव से भले ही अलग हों लेकिन कई मामलों में दोनों एक जैसे हैं। मसलन चुनावी चंदा। उम्मीदवारों के पक्ष या विरोध में प्रचार करने वाली पॉलीटिकल एक्शन कमेटियों को अमेरिकी चुनाव कानून के तहत पैसा जुटाने की इजाजत है, फिर भी वहां धारणा बन गई है कि ये कमेटियां चुनावी चंदे का बेजा इस्तेमाल राजनीतिक गुटबाजी और घटिया मकसदों को पूरा करने के लिए करती हैं। अमेरिका की एक संस्था सेंटर फॉर पब्लिक इंटीग्रिटी के मुताबिक चंदे के तौर पर मोटी रकम देने वालों को महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों से नवाजना एक परंपरा बन गई है। डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार राष्ट्रपति ओबामा के प्रचार के लिए करीब पचास हजार डॉलर की रकम देने वाले डोनाल्ड गिप्स की कंपनी को चौदह मिलियन डॉलर के ठेके देने और गिप्स को दक्षिण अफ्रीका का राजदूत बनाना ऐसा ही एक मसला है।

आख्रिर में सत्ता के दुरुपयोग की बातें। विपक्ष का आरोप है कि ओबामा सरकारी विमान से लेकर तमाम सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल अपने प्रचार के लिए कर रहे हैं। और सरकार कह रही है कि अमेरिका में ये तो हमेशा से ही होते आया है। है ना ठीक हमारी सरकारों की तरह।


Interesting piece by Dainik Bhaskar Correspondant from US.